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छत्तीसगढ़ी का शब्द भंडार समृद्ध, इसमें कार्यालयीन कार्य करना आसान है : डॉ. घृतलहरे

Ashutosh Gupta

ByAshutosh Gupta

Mar 13, 2024

आशुतोष गुप्ता

 

सीपत — शासकीय बिलासा कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय बिलासपुर में पदस्थ और शासकीय मदन लाल शुक्ल स्नातकोत्तर महाविद्यालय सीपत जिला बिलासपुर में हिन्दी विभाग में विभागाध्यक्ष के दायित्व का कुशलतापूर्वक निर्वहन कर रहे साहित्यकार और शिक्षाविद् डॉ. हेमन्त पाल घृतलहरे ने छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा महानदी भवन, नवा रायपुर में मंत्रालयीन अधिकारी/ कर्मचारियों को छत्तीसगढ़ी में कामकाज करने आयोजित त्रिदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में दूसरे दिन मुख्य वक्ता/प्रशिक्षक के रूप में उपस्थित होकर प्रशिक्षण दिया।

छ.ग. राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण और छत्तीसगढ़ी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। डॉ. घृतलहरे ने आयोग के इन कार्यों और ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आयोजन की सराहनीय की। उन्होंने छत्तीसगढ़ी की वंदना में केदार यादव के गाए गीत “मोर भाखा संग दया मया के सुग्घर हावय मिलाप रे” का गायन किया। मुख्य वक्ता/ प्रशिक्षक के रूप में डॉ. हेमन्त पाल घृतलहरे ने कहा कि हम सब छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़िया की सेवा के लिए नियुक्त किए गए हैं और इनकी सेवा छत्तीसगढ़ी के बिना नहीं हो सकती। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने निज भाषा की उन्नति को विकास का आधार बताया था और कहा था कि निज भाषा की उन्नति से स्वाभिमान और आत्म सम्मान पैदा होता है।

 

अतः हमें छत्तीसगढ़ी के विकास पर ध्यान देना होगा। छत्तीसगढ़ी गंवारू भाषा नहीं, जन भाषा है। इतिहास गवाह है कि महान लोगों ने सदा लोक भाषा को चुना है, जैसे बुद्ध ने पालि को चुना, महावीर ने प्राकृत को चुना, कबीर ने सधुक्कड़ी को चुना, धर्मदास और गुरु घासीदास ने छत्तीसगढ़ी को चुना, गांधी ने हिंदुस्तानी को चुना क्योंकि लोकभाषा के माध्यम से जनता के दिलों तक पहुंच बनाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ी भी लोक भाषा है और इसके माध्यम से ही छत्तीसगढ़ की जनता से भावनात्मक जुड़ाव हो सकता है। छत्तीसगढ़ी को लेकर हमारे मन में हीनभावना की ग्रंथि विकसित हो गई है,जिसे हटाना अत्यंत आवश्यक है। अवधि की बहन छत्तीसगढ़ी बड़ी मधुर और शब्द भंडार से काफी समृद्ध भाषा है, इसमें अभिव्यक्ति की अपूर्व क्षमता है, इसलिए इसके लोक व्यवहार में गर्व की अनुभूति करें। कोई भी भाषा परफेक्ट नहीं होती, वह विकास की प्रक्रिया में गतिमान होती है, इसलिए भाषा के परफेक्ट रूप की प्रतीक्षा किए बगैर आज से ही छत्तीसगढ़ी का कार्यालयीन व्यवहार शुरू करें। भाषा में कुशलता कैसे प्राप्त करें, इस का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि “करत करत अभ्यास के जड़ मति होत सुजान” अर्थात अभ्यास से ही कुशलता आएगी। हमें छत्तीसगढ़ी सुनना है, पढ़ना है, बोलना है, लिखना है, इसके पहले छत्तीसगढ़ी में विचार करने का अभ्यास करना है ताकि हमारी अभिव्यक्ति धारा प्रवाह हो सके। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा को सीखने में संकोच न करें, छत्तीसगढ़ी का भविष्य उज्ज्वल है। उन्होंने कार्यालय में प्रयोग होने वाले हिंदी अंग्रेजी और अन्य राज्यों की भाषा के शब्दों की तुलना करते हुए इसके लिए छत्तीसगढ़ी के उपयुक्त शब्दों के चयन एवं वाक्यों के प्रयोग की जानकारी भी दी। छत्तीसगढ़ी में बातचीत, आवेदन, नोटशीट, आदेश, प्रमाण पत्र जारी करने संबंधी प्रक्रिया व शब्दावली की जानकारी भी दी।

इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि संस्कृति एवं राजभाषा विभाग के संचालक विवेक आचार्य थे, अध्यक्षता छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सचिव डॉ. अनिल कुमार भतपहरी ने की। प्रशिक्षण में मंत्रालयीन अधिकारी कर्मचारी संघ के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, पूर्व अध्यक्ष, स्टेनो संघ के अध्यक्ष, देवलाल भारती, बघेल, कीर्तिवर्धन तिवारी, सुषमा गौराहा, कांति सूर्यवंशी, आदर्श दुबे, वरिष्ठ साहित्यकार रामेश्वर शर्मा और सैकड़ों की संख्या में मंत्रालयीन अधिकारी कर्मचारीगण उपस्थित रहे। अंत में डॉ. घृतलहरे ने सबको मिलकर छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़िया और छत्तीसगढ़ी के विकास में योगदान देने का आहवान किया। इस अवसर पर सभी प्रतिभागियों को किटबैग के साथ छत्तीसगढ़ी लोक व्यवहार व छत्तीसगढ़ी प्रशासनिक शब्दकोश का वितरण भी किया गया।

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